लिफ्ट में सफर करने वालों के लिए बड़ी खबर: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, हादसा होने पर निर्माता, मेंटेनेंस एजेंसी और बिल्डिंग मालिक होंगे जिम्मेदार
पीड़ित को मुआवजे के लिए दोष साबित करने की जरूरत नहीं, किसी भी जिम्मेदार पक्ष से ले सकेगा पूरी भरपाई
देशभर में रोजाना करोड़ों लोग लिफ्ट और एलिवेटर का इस्तेमाल करते हैं। अपार्टमेंट, ऑफिस, अस्पताल, मॉल, होटल और सरकारी इमारतों में लिफ्ट अब जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुकी है। लेकिन लिफ्ट हादसों में अक्सर पीड़ितों और उनके परिवारों को यह तय करने में लंबा संघर्ष करना पड़ता था कि गलती आखिर किसकी थी—लिफ्ट बनाने वाली कंपनी की, मेंटेनेंस एजेंसी की या बिल्डिंग प्रबंधन की।
ऐसे मामलों में अब सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले ने लिफ्ट यात्रियों के अधिकारों को मजबूत कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लिफ्ट में सफर करने वाले व्यक्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल एक पक्ष की नहीं, बल्कि उससे जुड़े सभी जिम्मेदार पक्षों की होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिफ्ट एक ऐसी सेवा है, जिसमें यात्री अपनी सुरक्षा पूरी तरह संचालक और प्रबंधन के भरोसे छोड़ देता है। इसलिए लिफ्ट संचालन से जुड़े लोगों पर सामान्य सावधानी से कहीं ज्यादा उच्च स्तर की सुरक्षा जिम्मेदारी (Highest Standard of Care) लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने लिफ्ट हादसों के मामलों में जिम्मेदारी तय करते हुए कहा कि दुर्घटना होने पर जवाबदेही इन पक्षों की हो सकती है—
1. लिफ्ट निर्माता या इंस्टॉलर कंपनी
लिफ्ट की डिजाइन, निर्माण और इंस्टॉलेशन में किसी तरह की तकनीकी कमी होने पर कंपनी जिम्मेदार होगी।
2. लिफ्ट मेंटेनेंस एजेंसी
समय पर सर्विसिंग, जांच और खराबी दूर करने की जिम्मेदारी लेने वाली एजेंसी की भी जवाबदेही तय होगी।
3. बिल्डिंग मालिक या प्रबंधन
जिस इमारत में लिफ्ट लगी है, वहां के मालिक, सोसायटी या प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना होगा कि लिफ्ट सुरक्षित स्थिति में ही संचालित हो।
अदालत ने लिफ्ट को एक तरह से "कॉमन कैरियर" (Common Carrier) के रूप में माना है। यानी ऐसी व्यवस्था जो यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती है और जिस पर यात्रियों की सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी होती है।
हादसे के बाद पीड़ितों के लिए बड़ी राहत
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब पीड़ित या मृतक के परिवार को मुआवजे के लिए पहले यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि गलती किसकी थी।
यानी यदि लिफ्ट हादसे में कोई व्यक्ति घायल होता है या उसकी मौत हो जाती है तो वह किसी एक जिम्मेदार पक्ष से मुआवजे का दावा कर सकता है।
इसके बाद संबंधित पक्ष आपस में यह तय करेंगे कि किसकी कितनी जिम्मेदारी थी।
इससे उन मामलों में राहत मिलेगी जहां पहले लिफ्ट कंपनी, मेंटेनेंस एजेंसी और बिल्डिंग प्रबंधन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते थे और पीड़ित परिवार को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते थे।
किस मामले से जुड़ा है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वर्ष 2003 में दिल्ली स्थित रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) मुख्यालय में हुए एक दर्दनाक लिफ्ट हादसे से जुड़े मामले में आया।
इस हादसे में पूर्व राजनयिक विपिन हांडा लिफ्ट दुर्घटना का शिकार हुए थे। जानकारी के अनुसार, लिफ्ट में खराबी के बावजूद सुरक्षा उपायों की कमी रही और रेस्क्यू के दौरान लिफ्ट अचानक चल पड़ी, जिससे उनकी मौत हो गई। इस मामले में लिफ्ट में पहले से तकनीकी समस्याएं होने की बात सामने आई थी।
मामले में पीड़ित परिवार को करीब 3 करोड़ रुपए से अधिक मुआवजे का आदेश दिया गया। जिम्मेदारी का बंटवारा भी किया गया—
लिफ्ट कंपनी की जिम्मेदारी: 70 प्रतिशत
मेंटेनेंस और इंजीनियरिंग एजेंसी: 25 प्रतिशत
बिल्डिंग प्रबंधन: 5 प्रतिशत
हाउसिंग सोसायटी और बिल्डिंग मैनेजमेंट के लिए चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA), अपार्टमेंट सोसायटी, ऑफिस बिल्डिंग और संस्थानों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अब लिफ्ट की सुरक्षा को लेकर लापरवाही भारी कानूनी और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
बिल्डिंग प्रबंधन को इन बातों का ध्यान रखना होगा—
नियमित मेंटेनेंस जरूरी
लिफ्ट की समय-समय पर अधिकृत एजेंसी से जांच करानी होगी।
शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
यदि लिफ्ट में झटका लग रहा है, आवाज आ रही है या दरवाजे में खराबी है तो तुरंत कार्रवाई करनी होगी।
रिकॉर्ड रखना जरूरी
मेंटेनेंस रिपोर्ट, निरीक्षण रिपोर्ट और मरम्मत रिकॉर्ड सुरक्षित रखने होंगे।
खराब लिफ्ट को तुरंत बंद करना होगा
यदि लिफ्ट असुरक्षित लग रही है तो उसे इस्तेमाल के लिए खुला नहीं छोड़ा जा सकता।
इमरजेंसी सिस्टम जरूरी
लिफ्ट में अलार्म, इंटरकॉम और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था चालू स्थिति में होनी चाहिए।
लिफ्ट इस्तेमाल करने वालों को भी रखना होगा ध्यान
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जहां लिफ्ट संचालन से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी बढ़ी है, वहीं यात्रियों को भी कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए।
लिफ्ट इस्तेमाल करते समय—
क्षमता से ज्यादा लोगों के साथ लिफ्ट में प्रवेश न करें।
लिफ्ट बीच में अटक जाए तो जबरदस्ती दरवाजा खोलने की कोशिश न करें।
अंदर लगे अलार्म या इमरजेंसी सिस्टम का इस्तेमाल करें।
रेस्क्यू के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों का इंतजार करें।
लिफ्ट में झटका, आवाज या खराबी महसूस होने पर तुरंत शिकायत करें।
कई बार छोटी खराबियां ही बड़े हादसों का कारण बनती हैं।
लिफ्ट सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ संदेश गया है कि यात्रियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
अब लिफ्ट हादसों में निर्माता कंपनी, मेंटेनेंस एजेंसी और बिल्डिंग प्रबंधन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बच नहीं सकेंगे। हर उस व्यक्ति और संस्था की कानूनी जिम्मेदारी होगी, जो लिफ्ट की डिजाइन, संचालन और देखरेख से जुड़ी है।
देश में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और ऊंची इमारतों के दौर में यह फैसला लाखों लिफ्ट उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षा का भरोसा मजबूत करता है।
मुख्य बातें एक नजर में
सुप्रीम कोर्ट ने लिफ्ट यात्रियों के अधिकार मजबूत किए
लिफ्ट हादसे में निर्माता, मेंटेनेंस एजेंसी और बिल्डिंग प्रबंधन जिम्मेदार हो सकते हैं
पीड़ित को पहले गलती साबित करने की जरूरत नहीं होगी
किसी एक जिम्मेदार पक्ष से पूरा मुआवजा मांगा जा सकेगा
हाउसिंग सोसायटी और बिल्डिंग मालिकों की जिम्मेदारी बढ़ी
नियमित जांच और सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी
news desk MPcg