MP में माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर से घटा 371 वर्ग किमी जंगल, देश में सबसे ज्यादा वन क्षेत्र खोने वाला राज्य बना मध्य प्रदेश

MP में माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर से घटा 371 वर्ग किमी जंगल, देश में सबसे ज्यादा वन क्षेत्र खोने वाला राज्य बना मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ रही सड़क, हाईवे, रेलवे, खनन और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का असर अब प्रदेश के वन क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच मध्य प्रदेश में 371.54 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कम हुआ है। इसी के साथ प्रदेश देश में सबसे अधिक वन क्षेत्र खोने वाला राज्य बन गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में विकास परियोजनाओं के लिए प्रदेश की करीब 24,969.87 हेक्टेयर वन भूमि का लैंड यूज बदला गया। यानी बड़ी मात्रा में वन भूमि का उपयोग सड़क निर्माण, खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और अन्य आधारभूत ढांचा विकसित करने के लिए किया गया। वन क्षेत्र में लगातार हो रही इस कमी को पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से गंभीर माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों के घटने से प्रदेश के प्रमुख टाइगर रिजर्व बांधवगढ़, कान्हा, पन्ना और सतपुड़ा के बीच मौजूद प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोर प्रभावित हो सकते हैं। यदि यह स्थिति जारी रही तो वन्यजीवों की आवाजाही बाधित होगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका भी बढ़ सकती है। इसके अलावा जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी इसका असर पड़ सकता है।

हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वन भूमि के डायवर्जन के बदले प्रतिपूरक वनीकरण करना अनिवार्य है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत परियोजनाओं को स्वीकृति देते समय नए जंगल विकसित करने की शर्त रखी जाती है। इसके लिए CAMPA फंड के माध्यम से पौधारोपण और नए वन विकसित करने का प्रावधान भी किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण और वन क्षेत्र को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन बनाना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले समय में यही संतुलन मध्य प्रदेश के जंगलों और वन्यजीवों के भविष्य को तय करेगा।