उत्तराखंड के जंगलों में आग का कहर पिछले साल से 90% ज्यादा नुकसान, 533 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र राख

उत्तराखंड के जंगलों में आग का कहर पिछले साल से 90% ज्यादा नुकसान, 533 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र राख

उत्तराखंड में इस बार का फायर सीजन जंगलों के लिए बेहद विनाशकारी साबित हुआ है। वन विभाग के तमाम इंतजाम और हजारों फायर वाचर्स की तैनाती के बावजूद राज्य के जंगलों में लगी आग ने भारी तबाही मचाई। आंकड़ों के मुताबिक, 1 नवंबर 2025 से 15 जून 2026 तक चले फायर सीजन में 533.57 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र आग की चपेट में आ गया, जो पिछले सीजन की तुलना में 90.56 प्रतिशत अधिक नुकसान है।

640 घटनाओं में धधके जंगल, प्लांटेशन भी हुए प्रभावित

इस फायर सीजन के दौरान राज्यभर में वनाग्नि की 640 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें करीब 9 हेक्टेयर प्लांटेशन क्षेत्र भी जलकर नष्ट हो गया। कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक कई वन क्षेत्रों में लगातार आग लगने की घटनाएं सामने आईं, जिससे जैव विविधता और वन्यजीवों पर भी गंभीर असर पड़ा।

पिछले साल के मुकाबले दोगुना नुकसान

यदि पिछले फायर सीजन से तुलना करें तो 1 नवंबर 2024 से 15 जून 2025 के बीच वनाग्नि की 239 घटनाओं में 280.05 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए थे। इस बार नुकसान बढ़कर 533.57 हेक्टेयर तक पहुंच गया, जो लगभग 90 प्रतिशत अधिक है। यह आंकड़ा राज्य में बढ़ते वनाग्नि संकट की गंभीर तस्वीर पेश करता है।

कम बारिश और सूखा बना सबसे बड़ा कारण

विशेषज्ञों और वन विभाग के अनुसार, इस बार सर्दियों में देर से बारिश और कम बर्फबारी, जबकि गर्मियों में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण जंगलों में नमी की कमी रही। सूखी घास, पत्तियां और चीड़ का पीरूल तेजी से आग फैलने का कारण बने, जिससे छोटी घटनाएं भी बड़े जंगलों को अपनी चपेट में लेती चली गईं।

वन विभाग के प्रयास भी नहीं रोक पाए आग

वन विभाग ने इस बार 5500 से अधिक फायर वाचर्स की तैनाती, पीरूल संग्रह अभियान और जागरूकता कार्यक्रम चलाए थे। इसके बावजूद आग की घटनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पाया जा सका। कई दुर्गम इलाकों में आग बुझाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

पर्यावरण और वन्यजीवों पर गहरा असर

वनाग्नि के कारण न सिर्फ हजारों पेड़-पौधे नष्ट हुए, बल्कि वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हुए। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन और सूखे की स्थिति इसी तरह बनी रही तो आने वाले वर्षों में वनाग्नि की घटनाएं और गंभीर रूप ले सकती हैं।