चांद पर आज टकराएगा फाल्कन-9 रॉकेट का मलबा: बनेगा नया गड्ढा, वैज्ञानिकों को मिलेगी चंद्र सतह की अहम जानकारी

चांद पर आज टकराएगा फाल्कन-9 रॉकेट का मलबा: बनेगा नया गड्ढा, वैज्ञानिकों को मिलेगी चंद्र सतह की अहम जानकारी

अंतरिक्ष में भटक रहा स्पेसएक्स के फाल्कन-9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा बुधवार को चंद्रमा की सतह से टकराने वाला है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह टक्कर करीब 8,700 किलोमीटर प्रति घंटे (लगभग 2.5 किलोमीटर प्रति सेकंड) की रफ्तार से होगी। इस घटना से चंद्रमा की सतह पर एक नया गड्ढा बन सकता है और वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर होने वाली प्राकृतिक और कृत्रिम टक्करों को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

इस अंतरिक्ष मलबे को वैज्ञानिकों ने 2025-010D नाम दिया है। अनुमान है कि यह चंद्रमा के आइंस्टीन क्रेटर क्षेत्र के पास टकरा सकता है।

भारतीय समयानुसार दोपहर 12:05 बजे होगी टक्कर

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, फाल्कन-9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा बुधवार को भारतीय समयानुसार करीब दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर चंद्रमा से टकराने की संभावना है।

हालांकि यह घटना पृथ्वी से सीधे आंखों से दिखाई नहीं देगी, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि शक्तिशाली टेलिस्कोप की मदद से टक्कर के बाद उठने वाले धूल के गुबार को देखा जा सकता है।

अनुमान लगाया गया है कि इस टक्कर से चंद्रमा की सतह से धूल और मलबा करीब 50 किलोमीटर तक ऊपर उठ सकता है।

करीब 4 हजार किलो वजनी है रॉकेट का हिस्सा

वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह फाल्कन-9 रॉकेट का ऊपरी चरण है, जिसका वजन करीब 4,000 किलोग्राम बताया जा रहा है।

इसका आकार लगभग पांच मंजिला इमारत के बराबर माना जा रहा है।

अंतरिक्ष में छोड़े गए रॉकेट के कई हिस्से दोबारा पृथ्वी पर लौट आते हैं, लेकिन कुछ ऊपरी चरण अंतरिक्ष में ही रह जाते हैं और लंबे समय तक अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं।

17 मीटर तक हो सकता है नया गड्ढा

खगोलशास्त्री बिल ग्रे और अन्य वैज्ञानिकों ने इस घटना की जानकारी सबसे पहले साझा की थी।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि रॉकेट के चंद्रमा से टकराने के बाद सतह पर करीब 17 मीटर व्यास का नया क्रेटर (गड्ढा) बन सकता है।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टक्कर से चंद्रमा को कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा। चंद्रमा पर पहले से ही करोड़ों वर्षों में उल्कापिंडों की टक्कर से कई बड़े गड्ढे मौजूद हैं।

कैसे चंद्रमा तक पहुंचा फाल्कन-9 का मलबा?

यह रॉकेट हिस्सा जनवरी 2025 में लॉन्च किए गए एक अंतरिक्ष मिशन से जुड़ा बताया जा रहा है।

इस मिशन के तहत अमेरिका और जापान के संयुक्त प्रयास से चंद्रमा पर दो लैंडर और वैज्ञानिक उपकरण भेजे गए थे।

मिशन के बाद फाल्कन-9 रॉकेट का ऊपरी हिस्सा अंतरिक्ष में रह गया और धीरे-धीरे उसकी कक्षा ऐसी बनी कि वह चंद्रमा की ओर बढ़ने लगा।

वैज्ञानिक क्यों कर रहे हैं इस घटना का इंतजार?

चंद्रमा पर किसी मानव निर्मित वस्तु की टक्कर वैज्ञानिकों के लिए अध्ययन का एक महत्वपूर्ण अवसर होती है।

इस घटना से वैज्ञानिकों को जानकारी मिल सकती है कि:

चंद्रमा की सतह पर टक्कर का असर कितना होता है।
धूल और मलबा कितनी ऊंचाई तक पहुंचता है।
कृत्रिम वस्तुओं के गिरने से किस तरह के गड्ढे बनते हैं।
भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए सतह को बेहतर तरीके से कैसे समझा जा सकता है।
क्या पृथ्वी से दिखाई देगा यह नजारा?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह टक्कर पृथ्वी से सीधे दिखाई नहीं देगी।

इसका मुख्य कारण है कि चंद्रमा पर घटना का स्थान और समय ऐसा है कि सामान्य दूरबीनों से इसे देखना मुश्किल होगा।

हालांकि बड़े वैज्ञानिक टेलिस्कोप और अंतरिक्ष निगरानी उपकरण टक्कर के बाद होने वाले बदलावों का अध्ययन कर सकते हैं।

चंद्रमा पर पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

चंद्रमा पर अंतरिक्ष मलबे की टक्कर कोई पहली घटना नहीं है।

अंतरिक्ष एजेंसियां पहले भी जानबूझकर या अनजाने में चंद्रमा की सतह पर वस्तुओं की टक्कर करा चुकी हैं ताकि वहां की मिट्टी और सतह के बारे में जानकारी जुटाई जा सके।

वैज्ञानिकों के लिए ऐसी घटनाएं चंद्रमा की संरचना और भविष्य के मानव मिशनों की तैयारी में मददगार साबित होती हैं।

स्पेस मलबा बन रहा बड़ी चुनौती

दुनिया में लगातार बढ़ते अंतरिक्ष अभियानों के कारण स्पेस डेब्रिस (अंतरिक्ष मलबा) वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

रॉकेट के बचे हुए हिस्से, पुराने उपग्रह और अन्य उपकरण अंतरिक्ष में लंबे समय तक घूमते रहते हैं।

इनमें से कुछ हिस्से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर नष्ट हो जाते हैं, जबकि कुछ अंतरिक्ष में बने रहते हैं और दूसरे खगोलीय पिंडों तक पहुंच सकते हैं।

फाल्कन-9 रॉकेट के इस हिस्से की चंद्रमा से टक्कर वैज्ञानिकों के लिए किसी तबाही से ज्यादा एक अंतरिक्ष प्रयोग है। इस घटना से मिलने वाली जानकारी भविष्य के चंद्र अभियानों और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।