जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे पर उमर अब्दुल्ला का केंद्र पर बड़ा हमला, बोले- "अगर फैसले राजभवन से ही लेने हैं तो चुनाव क्यों कराए गए?"

जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे पर उमर अब्दुल्ला का केंद्र पर बड़ा हमला, बोले- "अगर फैसले राजभवन से ही लेने हैं तो चुनाव क्यों कराए गए?"

राज्य बहाली की मांग को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस का दिल्ली में प्रदर्शन, उमर ने कहा- जनता के जनादेश का सम्मान होना चाहिए

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य का दर्जा बहाल करने में हो रही देरी को लेकर केंद्र सरकार पर एक बार फिर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अगर वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति निर्वाचित सरकार के पास नहीं है और महत्वपूर्ण फैसले राजभवन से ही लिए जाने हैं, तो फिर विधानसभा चुनाव कराने का उद्देश्य क्या रह जाता है।

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जम्मू-कश्मीर की जनता ने लोकतंत्र में विश्वास जताते हुए चुनावों में हिस्सा लिया, अपनी सरकार चुनी और अपना जनादेश दिया। अब केंद्र सरकार को जनता के इस फैसले का सम्मान करना चाहिए और राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा केवल प्रशासनिक व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर के लोगों की राजनीतिक पहचान, अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा विषय है।

उमर अब्दुल्ला ने याद दिलाया केंद्र का पुराना रोडमैप

हजरतबल में नेशनल कॉन्फ्रेंस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दिए गए तर्कों का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने खुद जम्मू-कश्मीर में सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए तीन चरणों की बात कही थी।

इन चरणों में शामिल थे:

परिसीमन प्रक्रिया पूरी करना
विधानसभा चुनाव कराना
राज्य का दर्जा वापस बहाल करना

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और विधानसभा चुनाव भी संपन्न हो चुके हैं। जनता ने अपना फैसला सुना दिया है और अब राज्य का दर्जा बहाल करने का समय आ गया है।

उन्होंने सवाल किया कि जब पहले बताए गए दो चरण पूरे हो चुके हैं तो तीसरे चरण को लागू करने में इतनी देरी क्यों की जा रही है।

"क्या जम्मू-कश्मीर की जनता की जीत ही उसकी सजा बन गई?"

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव में जनता ने जिस सरकार को चुना है, उसे काम करने के लिए पर्याप्त अधिकार मिलने चाहिए।

उन्होंने केंद्र पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि जनता वोट देकर सरकार बनाए और फिर वही सरकार निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रहे।

उन्होंने कहा,

"जनता ने लोकतंत्र में हिस्सा लिया, चुनाव हुए और उन्होंने अपना फैसला दिया। लेकिन क्या अब जनता की जीत को ही उसकी सजा बना दिया गया है?"

उमर ने कहा कि अगर हर बड़ा प्रशासनिक फैसला राजभवन से लिया जाएगा, अधिकारियों पर कार्रवाई वहीं से होगी और सरकार केवल नाम मात्र की रह जाएगी, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

"अगर राजभवन से ही सरकार चलानी है तो चुनाव क्यों?"

उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में सीधे सवाल उठाया कि अगर केंद्र शासित प्रदेश जैसी व्यवस्था में भी सारे महत्वपूर्ण फैसले उपराज्यपाल या राजभवन के माध्यम से ही लिए जाने हैं तो फिर जनता से वोट मांगने का क्या औचित्य है।

उन्होंने कहा कि चुनी हुई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और उसे अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोग लंबे समय से राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक अधिकारों की उम्मीद कर रहे हैं।

परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी केंद्र पर लगाए आरोप

उमर अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन के दौरान राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने की कोशिश की गई।

उमर ने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस को पहले से आशंका थी कि परिसीमन प्रक्रिया में बदलाव किए जाएंगे और इससे राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने दावा किया कि इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर की जनता ने चुनाव में अपना फैसला सुनाया और भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों को समर्थन नहीं दिया।

हालांकि केंद्र सरकार का पक्ष रहा है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया थी, जिसका उद्देश्य जनसंख्या और प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना था।

प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से कई बार उठा चुके हैं मुद्दा

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के राज्य दर्जे का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार के अन्य वरिष्ठ नेताओं के सामने कई बार उठाया है।

उन्होंने कहा कि हर बैठक में उन्होंने इस मांग को प्रमुखता से रखा।

उमर ने कहा,

"हर बार हमें जवाब मिलता है कि उचित समय आने पर राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि वह उचित समय कब आएगा?"

उन्होंने कहा कि अब इस मामले में स्पष्ट समयसीमा तय होनी चाहिए ताकि जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्थिति की जानकारी हो सके।

20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेगी नेशनल कॉन्फ्रेंस

राज्य दर्जे की मांग को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अब आंदोलन का रास्ता अपनाने का फैसला किया है।

उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की कि पार्टी 20 जुलाई को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेगी।

उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शन लोकतांत्रिक तरीके से किया जाएगा और इसके जरिए केंद्र सरकार तक जम्मू-कश्मीर के लोगों की मांग पहुंचाई जाएगी।

उन्होंने कहा कि पार्टी किसी टकराव की राजनीति नहीं चाहती, लेकिन अपने अधिकारों और जनता की मांगों को उठाना उसका लोकतांत्रिक कर्तव्य है।

लद्दाख का उदाहरण देकर केंद्र को घेरा

उमर अब्दुल्ला ने लद्दाख का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी संवैधानिक सुरक्षा और अधिकारों को लेकर मांग उठ रही है।

उन्होंने कहा कि एक तरफ लद्दाख के लिए विशेष सुरक्षा उपायों पर चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर को अभी तक राज्य का दर्जा नहीं मिला है।

उन्होंने सवाल किया कि अगर देश में समान अधिकार और समान व्यवस्था की बात की जाती है तो जम्मू-कश्मीर की मांग पर भी विचार होना चाहिए।

भाजपा को खुली चुनौती

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि अगर राज्य दर्जा बहाल करने को लेकर कोई राजनीतिक सोच है तो उसे सार्वजनिक रूप से सामने रखा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार यह मानती है कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा तभी मिलेगा जब भाजपा की सरकार बनेगी, तो इसे खुले तौर पर कहा जाना चाहिए।

उमर ने कहा कि जनता को भ्रम की स्थिति में नहीं रखा जाना चाहिए।

बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला को याद किया

कार्यक्रम में उमर अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की वरिष्ठ नेता और अपनी दादी बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला को याद किया।

उन्होंने कहा कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में कई कठिन दौर देखे।

उमर ने कहा कि उन्होंने शेख अब्दुल्ला के जेल जाने, राजनीतिक संघर्ष और पार्टी के विभाजन जैसी परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन कभी धैर्य नहीं खोया।

उन्होंने कहा कि उनकी सीख थी कि धैर्य कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है।

उमर ने कहा,

"हमारा सब्र हमारी ताकत है, लेकिन इसे आत्मसमर्पण नहीं समझा जाना चाहिए।"

2019 के बाद बदला जम्मू-कश्मीर का राजनीतिक ढांचा

जम्मू-कश्मीर में वर्तमान राजनीतिक स्थिति अगस्त 2019 के बाद बदली, जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को समाप्त कर दिया।

इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन किया गया और इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया:

जम्मू-कश्मीर
लद्दाख

जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।

इसके बाद लंबे समय तक राजनीतिक गतिविधियां सीमित रहीं। बाद में विधानसभा चुनाव कराए गए और नई सरकार का गठन हुआ।

राज्य दर्जे की बहाली क्यों है बड़ा मुद्दा?

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों का कहना है कि राज्य का दर्जा बहाल होने से:

प्रशासनिक अधिकार बढ़ेंगे
स्थानीय निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होगी
लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूती मिलेगी
जनता और सरकार के बीच सीधा संबंध मजबूत होगा

वहीं केंद्र सरकार का कहना रहा है कि राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्णय सुरक्षा स्थिति और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लिया जाएगा।

आने वाले दिनों में बढ़ सकती है राजनीतिक हलचल

उमर अब्दुल्ला के ताजा बयान के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति में राज्य दर्जे का मुद्दा फिर से केंद्र में आ गया है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस अब दिल्ली में प्रदर्शन की तैयारी कर रही है, जबकि केंद्र सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई नया फैसला सामने नहीं आया है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में राज्य दर्जे की बहाली जम्मू-कश्मीर की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकती है।