झाबुआ में खौफ के साए में 116 आदिवासियों की जिंदगी: 7 साल पुराने खूनी विवाद के बाद टूटा घर, छूटी पढ़ाई; पुलिस पहरे में भी डर नहीं हुआ खत्म
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जहां एक पूरा कुनबा आज भी सात साल पुराने विवाद की छाया में जीने को मजबूर है। दोतड़ गांव के सालेड़ा फलिया में रहने वाले 116 सदस्यीय आदिवासी परिवार के लिए घर लौटना आसान नहीं रहा। प्रशासन की मदद से वापसी तो हुई, लेकिन डर, तनाव और असुरक्षा अब भी उनके जीवन का हिस्सा बने हुए हैं।
परिवार के बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है। महिलाएं टूटी झोपड़ियों और अस्थायी ठिकानों में रह रही हैं। पुरुष सदस्य सुरक्षा कारणों से गांव से बाहर रहने को मजबूर हैं। परिवार का कहना है कि वे अपनी जमीन और घर वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अब भी खतरा महसूस होता है।
गांव में पुलिस की तैनाती है, लेकिन परिवार का कहना है कि उन्हें पूरी सुरक्षा का भरोसा नहीं मिल पा रहा है।
"पहले जान बचानी है, फिर पढ़ाई करेंगे" — बच्चों की दर्दभरी कहानी
इस परिवार की 16 वर्षीय रीना की कहानी इस पूरे मामले की सबसे बड़ी तस्वीर दिखाती है।
रीना बताती है कि डर की वजह से उसकी पढ़ाई छूट गई है। वह कहती है कि अब उसे यह तक याद नहीं कि वह किस कक्षा में पढ़ती थी।
उसके शब्दों में डर साफ दिखाई देता है। रीना का कहना है कि स्कूल जाने से पहले उसे अपनी सुरक्षा की चिंता सताती है।
रीना अकेली नहीं है। परिवार के करीब 20 अन्य बच्चों ने भी स्कूल जाना बंद कर दिया है। इन बच्चों का बचपन गांव की गलियों और स्कूल के मैदान में बीतने के बजाय डर और तनाव के बीच गुजर रहा है।
शादी समारोह से शुरू हुआ विवाद, बदल गई पूरी जिंदगी
इस पूरे मामले की जड़ 17 मई 2019 की एक घटना है।
गांव में एक शादी समारोह आयोजित किया गया था। आरोप है कि इसी दौरान डीजे बजाने को लेकर दो पक्षों में विवाद शुरू हुआ। शुरुआत में कहासुनी हुई, लेकिन देखते ही देखते विवाद हिंसक संघर्ष में बदल गया।
इस संघर्ष में वक्का भूरिया नामक व्यक्ति की मौत हो गई।
हत्या के मामले में दूसरे पक्ष के नौ लोगों को आरोपी बनाया गया। पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया। मामला अदालत तक पहुंचा और न्यायालय ने आरोपियों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
समय बीतने के साथ आठ आरोपी जमानत पर बाहर आ गए, जबकि एक आरोपी की जेल में मौत हो गई।
लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी गांव का तनाव खत्म नहीं हुआ।
20 घर उजड़े, जमीन पर कब्जे का आरोप
परिवार का आरोप है कि हत्या की घटना के बाद बदले की कार्रवाई के तौर पर उनके घरों को निशाना बनाया गया।
उनका कहना है कि करीब 20 मकान तोड़ दिए गए। घरों में रखा अनाज, घरेलू सामान और पशु भी ले जाए गए।
परिवार का सबसे बड़ा आरोप करीब 150 बीघा जमीन पर कब्जे का है।
उनका कहना है कि जिस जमीन पर उनके परिवार पीढ़ियों से खेती करता आया था, वहां अब वे आसानी से नहीं जा पा रहे हैं।
उस समय परिवार के पुरुष सदस्य जेल में थे। महिलाएं और बच्चे डर के कारण गांव छोड़कर गुजरात चले गए। एक पूरा परिवार अचानक अपने घर, खेत और रोजमर्रा की जिंदगी से दूर हो गया।
गुजरात में गुजारे दिन, गांव वापसी बनी चुनौती
कई वर्षों तक यह परिवार गांव से दूर रहा।
जब अदालत से आरोपियों को जमानत मिलनी शुरू हुई तो परिवार ने दोबारा अपने गांव लौटने की कोशिश शुरू की।
लेकिन वापसी का रास्ता आसान नहीं था।
परिवार का दावा है कि सामाजिक स्तर पर कई बार पंचायतें हुईं, लेकिन समाधान नहीं निकल पाया।
उन्होंने आरोप लगाया कि गांव में दोबारा बसने के लिए उनसे बड़ी रकम की मांग की गई।
परिवार का कहना है कि उन्होंने समझौते के लिए 8 से 10 लाख रुपए तक देने की बात कही, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।
एसपी कार्यालय पहुंचे परिवार, फिर मिली वापसी की अनुमति
लंबे संघर्ष के बाद परिवार ने प्रशासन से मदद मांगी।
उन्होंने झाबुआ पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर सुरक्षा और पुनर्वास की मांग की।
इसके बाद प्रशासन ने 19 जून को पुलिस सुरक्षा के बीच परिवार को वापस गांव पहुंचाया।
जब परिवार गांव लौटा तो उनके सामने पुराने घरों का मलबा था। जहां कभी पक्के मकान थे, वहां अब टूटी दीवारें और खाली जमीन दिखाई देती है।
सुरक्षा के लिए पुलिस कैंप, फिर भी परिवार डरा हुआ
परिवार की वापसी के समय भारी पुलिस बल तैनात किया गया था।
शुरुआत में 25 से अधिक पुलिस जवानों के साथ वरिष्ठ अधिकारियों को भी मौके पर लगाया गया।
समय के साथ सुरक्षा बल कम कर दिया गया।
अब गांव में करीब 5 से 6 पुलिस जवान लगातार तैनात रहते हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला पुलिसकर्मी भी मौजूद रहती हैं।
हालांकि परिवार का कहना है कि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद उन्हें पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं होता।
"हमारी क्या गलती है?" महिलाओं ने पूछे सवाल
परिवार की महिलाओं का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति ने अपराध किया था तो उसे कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए थी, लेकिन पूरे परिवार को उसकी कीमत क्यों चुकानी पड़ रही है।
परिवार के बुजुर्ग राजू भूरिया ने आरोप लगाया कि उनके घर तोड़े गए, सामान ले जाया गया और अब दोबारा घर बनाने में भी परेशानी आ रही है।
उनका कहना है कि वे शांति से अपना जीवन जीना चाहते हैं और अपनी जमीन पर खेती करना चाहते हैं।
बिजली कटी, पानी के लिए टैंकर पर निर्भर परिवार
गांव लौटने के बाद परिवार के सामने रोजमर्रा की जरूरतों की बड़ी चुनौती है।
महिलाओं का आरोप है कि उनकी बिजली व्यवस्था बाधित है। कई दिनों तक उन्हें अंधेरे में रहना पड़ा।
पानी की समस्या भी गंभीर है।
परिवार का कहना है कि पास में हैंडपंप होने के बावजूद उन्हें वहां से पानी लेने में परेशानी होती है। मजबूरी में उन्हें निजी टैंकर मंगवाना पड़ता है, जिसके लिए करीब 1200 रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं।
खुले आसमान के नीचे गुजर रही रातें
परिवार के कई सदस्य अभी भी स्थायी घर के इंतजार में हैं।
कई महिलाएं और बच्चे अस्थायी झोपड़ियों में रह रहे हैं।
रात के समय बच्चों को सांप और जहरीले जीवों से बचाने के लिए विशेष सावधानी रखनी पड़ती है।
परिवार का कहना है कि सात साल बाद भी वे सामान्य जिंदगी शुरू नहीं कर पाए हैं।
पुरुष गांव छोड़कर रहने को मजबूर
परिवार के पुरुष सदस्यों का कहना है कि सुरक्षा कारणों से वे गांव में नहीं रुक रहे।
उनका आरोप है कि गांव में तनाव अभी भी बना हुआ है।
एक सदस्य ने बताया कि परिवार तक राशन पहुंचाने और जरूरी सामान पहुंचाने के लिए भी कई बार पुलिस की मदद लेनी पड़ती है।
उनका कहना है कि वे अपने ही गांव में सामान्य नागरिक की तरह जीवन जीना चाहते हैं।
पुलिस और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
इस पूरे मामले में प्रशासन के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं।
पहली चुनौती है परिवार को सुरक्षित माहौल देना और बच्चों की शिक्षा दोबारा शुरू कराना।
दूसरी चुनौती है दोनों पक्षों के बीच वर्षों से चले आ रहे विवाद को स्थायी रूप से खत्म करना।
झाबुआ पुलिस अधीक्षक देवेंद्र पाटीदार ने कहा कि पुलिस मामले को गंभीरता से देख रही है।
उनके मुताबिक, दोनों पक्ष एक ही परिवार के रिश्तेदार हैं और प्रशासन बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास कर रहा है।
क्या खत्म होगा सात साल पुराना विवाद?
सालेड़ा फलिया का यह मामला सिर्फ एक गांव का विवाद नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि हिंसा के बाद पीड़ित परिवारों का पुनर्वास कितना प्रभावी हो पाता है।
116 लोगों का यह परिवार आज भी अपने पुराने घर, जमीन और सामान्य जीवन की तलाश में है।
बच्चों की छूटी पढ़ाई, महिलाओं की असुरक्षा और पुरुषों का गांव से दूर रहना बताता है कि सात साल पुरानी घटना के घाव अभी भी भरे नहीं हैं।
अब नजर प्रशासन की कार्रवाई पर है कि क्या यह परिवार वास्तव में भयमुक्त होकर अपने गांव में दोबारा बस पाएगा या फिर संघर्ष का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
news desk MPcg