गीता प्रेस का ऐतिहासिक कदम: पहली बार संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित होगी त्रिभाषी श्रीमद्भगवद्गीता, वैश्विक पाठकों को मिलेगा बड़ा लाभ
देश की प्रतिष्ठित धार्मिक प्रकाशन संस्था गीता प्रेस, गोरखपुर ने पहली बार संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित होने वाली त्रिभाषी श्रीमद्भगवद्गीता का लोकार्पण करने की घोषणा की है। लगभग एक शताब्दी के इतिहास में यह पहला अवसर है जब गीता प्रेस ने एक ही संस्करण में मूल संस्कृत श्लोकों के साथ हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध कराया है। इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी, भारतीय प्रवासी समुदाय (डायस्पोरा) और अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक भगवद्गीता के संदेश को अधिक सरल और सुलभ रूप में पहुंचाना है।
पहली बार तीन भाषाओं में एक साथ उपलब्ध होगी गीता
नई त्रिभाषी श्रीमद्भगवद्गीता में प्रत्येक श्लोक का मूल संस्कृत पाठ, उसके साथ हिंदी अनुवाद और अंग्रेजी अनुवाद एक ही पुस्तक में दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस संस्करण में ऐसे पाठकों को भी ध्यान में रखा गया है जो संस्कृत या देवनागरी लिपि से परिचित नहीं हैं, ताकि वे श्लोकों का उच्चारण और अर्थ दोनों आसानी से समझ सकें।
युवा पीढ़ी और वैश्विक पाठकों पर विशेष फोकस
गीता प्रेस का कहना है कि बदलते समय में भारतीय संस्कृति और सनातन दर्शन के प्रति दुनिया भर में रुचि बढ़ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह संस्करण तैयार किया गया है, जिससे विदेशों में रहने वाले भारतीय, विद्यार्थी, शोधकर्ता तथा भारतीय दर्शन में रुचि रखने वाले विदेशी पाठक भी भगवद्गीता का अध्ययन सरलता से कर सकें।
भाषाई बाधाएं होंगी कम
इस नए संस्करण का प्रमुख उद्देश्य भाषाई सीमाओं को कम करना है। एक ही पुस्तक में तीन भाषाओं की उपलब्धता से पाठकों को मूल संस्कृत श्लोक पढ़ने के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी में उनका अर्थ समझने की सुविधा मिलेगी। इससे धार्मिक अध्ययन, अकादमिक शोध और आध्यात्मिक अध्ययन करने वाले लोगों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
1923 से धर्मग्रंथों के प्रकाशन में अग्रणी है गीता प्रेस
1923 में स्थापित गीता प्रेस दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक प्रकाशन संस्थाओं में से एक मानी जाती है। पिछले एक शताब्दी से अधिक समय से यह संस्था कम कीमत पर हिंदू धर्मग्रंथों का प्रकाशन और वितरण करती आ रही है। श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, पुराण, उपनिषद, हनुमान चालीसा और 'कल्याण' मासिक पत्रिका सहित करोड़ों प्रतियां देश-विदेश में प्रकाशित और वितरित की जा चुकी हैं।
भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
धार्मिक और सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह त्रिभाषी संस्करण भारतीय आध्यात्मिक साहित्य को वैश्विक स्तर पर और अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विशेष रूप से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाली युवा पीढ़ी तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए यह संस्करण उपयोगी साबित हो सकता है।
अध्ययन और शोध में भी मिलेगा लाभ
शिक्षा और शोध से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही पुस्तक में मूल संस्कृत पाठ और दो प्रमुख भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध होने से विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, शोध संस्थानों तथा धार्मिक अध्ययन केंद्रों में इसका व्यापक उपयोग हो सकेगा। इससे भारतीय दर्शन और भगवद्गीता पर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों और शोधार्थियों को भी सुविधा मिलेगी।
सनातन साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
गीता प्रेस का यह प्रकाशन केवल धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास भी माना जा रहा है। डिजिटल युग में जहां बहुभाषी अध्ययन की मांग लगातार बढ़ रही है, वहां यह त्रिभाषी संस्करण भारतीय आध्यात्मिक साहित्य को नई पीढ़ी और वैश्विक समाज से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
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