भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास पेयजल पर सवाल, गैस पीड़ित संगठनों का दावा- 63 में से 43 पानी के नमूनों में मिला फीकल कोलीफॉर्म

भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास पेयजल पर सवाल, गैस पीड़ित संगठनों का दावा- 63 में से 43 पानी के नमूनों में मिला फीकल कोलीफॉर्म

भोपाल गैस त्रासदी प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। भोपाल गैस त्रासदी पीड़ित संगठनों ने शुक्रवार को दावा किया कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास रहने वाले लोगों को दूषित पानी की आपूर्ति की जा रही है। संगठनों का कहना है कि उनके द्वारा कराई गई जांच में बड़ी संख्या में पानी के नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो पानी में मलजनित प्रदूषण की मौजूदगी का संकेत देते हैं।

संगठनों ने इस मामले को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बताते हुए भोपाल नगर निगम और प्रशासन से तत्काल कदम उठाने की मांग की है। हालांकि, पानी की गुणवत्ता को लेकर आधिकारिक एजेंसियों की जांच रिपोर्ट और प्रशासनिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।

30 बस्तियों से लिए गए 63 पानी के सैंपल

भोपाल गैस पीड़ित संगठनों के अनुसार, इस महीने शहर की करीब 30 बस्तियों से पेयजल के नमूने एकत्र किए गए।

भोपाल गैस पीड़ित महिला-पुरुष संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष नवाब खान ने बताया कि कुल 63 पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे गए थे। इनमें से 43 नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।

संगठन का दावा है कि जांच में सामने आए आंकड़ों के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत नमूने दूषित पाए गए, जिससे प्रभावित इलाकों में पेयजल व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।

फीकल कोलीफॉर्म क्या बताता है?

फीकल कोलीफॉर्म ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जो आमतौर पर इंसानों और जानवरों के मल में पाए जाते हैं। पानी में इनकी मौजूदगी यह संकेत दे सकती है कि जल स्रोत या पाइपलाइन किसी स्तर पर सीवेज या गंदगी के संपर्क में आई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक ऐसे पानी का सेवन करने से दस्त, उल्टी, पेट संबंधी संक्रमण, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

हालांकि, किसी भी बीमारी के सीधे कारण की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय जांच और विस्तृत स्वास्थ्य अध्ययन जरूरी होता है।

बड़े तालाब और कोलार जल स्रोत को लेकर भी दावा

गैस पीड़ित संगठनों ने अपनी जांच रिपोर्ट में दावा किया कि:

बड़े तालाब (अपर लेक) से सप्लाई किए गए पानी के करीब 90 प्रतिशत नमूनों में दूषितता के संकेत मिले।
कोलार डैम से आने वाले पानी के करीब 25 प्रतिशत नमूने भी जांच में प्रभावित पाए गए।

संगठनों ने मांग की है कि शहर में सप्लाई होने वाले पानी की स्वतंत्र और नियमित जांच कराई जाए ताकि लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

दूषित पानी से बीमारियों का खतरा बढ़ने का आरोप

गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के आसपास रहने वाले लोग लंबे समय से पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं।

उनका आरोप है कि दूषित पानी के कारण प्रभावित इलाकों में दस्त, उल्टी, टाइफाइड और अन्य जलजनित बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं।

भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को लंबे समय से स्वच्छ पानी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि गैस त्रासदी के बाद से इन इलाकों में पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे लगातार चिंता का विषय रहे हैं।

यूनियन कार्बाइड कचरे से भूजल प्रदूषण का मुद्दा

भोपाल गैस त्रासदी दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक मानी जाती है। दिसंबर 1984 में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) के रिसाव से हजारों लोगों की मौत हुई थी और लाखों लोग प्रभावित हुए थे।

गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि फैक्ट्री परिसर में पड़े जहरीले कचरे और रासायनिक प्रदूषण का असर आसपास के क्षेत्रों के भूजल पर भी पड़ा।

संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और जल प्रदूषण की समस्या दूर करने के निर्देश दिए गए थे।

सीवर लाइन और ड्रेनेज व्यवस्था पर उठे सवाल

भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव ने आरोप लगाया कि प्रभावित क्षेत्रों में सीवर लाइन और ड्रेनेज व्यवस्था को लेकर लंबे समय से शिकायतें की जा रही हैं।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 में भी पेयजल में गंदगी मिलने की शिकायतों के बाद सीवर व्यवस्था सुधारने की मांग उठी थी, लेकिन अभी तक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।

संगठनों का आरोप है कि सीवर नेटवर्क की कमी और पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था के कारण पेयजल दूषित होने का खतरा बना हुआ है।

भागीरथपुरा जैसी घटना का हवाला देकर चेताया

संगठनों ने हाल ही में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से हुई बीमारी और मौतों की घटना का हवाला देते हुए कहा कि भोपाल में ऐसी स्थिति बनने से पहले प्रशासन को कदम उठाने चाहिए।

उन्होंने मांग की कि:

प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल पानी की जांच कराई जाए।
दूषित पाइपलाइन और सीवर व्यवस्था की समीक्षा हो।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
स्वतंत्र एजेंसी से पानी की गुणवत्ता की निगरानी कराई जाए।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग

भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने कहा कि यदि पेयजल में प्रदूषण की शिकायतें लंबे समय से आ रही थीं तो संबंधित विभागों को पहले ही कार्रवाई करनी चाहिए थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में लापरवाही नहीं होनी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

प्रशासन के सामने चुनौती

भोपाल में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर उठे इन सवालों के बाद अब प्रशासन और नगर निगम के सामने चुनौती है कि वह पानी की गुणवत्ता को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने रखे।

जहां गैस पीड़ित संगठन अपनी जांच रिपोर्ट के आधार पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं आधिकारिक स्तर पर पानी की गुणवत्ता की पुष्टि के लिए सरकारी जांच रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर हैं कि नगर निगम और प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल व्यवस्था सुधारने के लिए क्या कार्रवाई की जाती है।