150 करोड़ की 130 बीघा जमीन पर सरकार का कब्जा तय, 42 साल पुराने विवाद पर कोर्ट का बड़ा फैसला

150 करोड़ की 130 बीघा जमीन पर सरकार का कब्जा तय, 42 साल पुराने विवाद पर कोर्ट का बड़ा फैसला

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के तिर्वा क्षेत्र में स्थित करीब 130 बीघा जमीन को लेकर पिछले 42 वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद आखिरकार समाप्त हो गया। तीन पीढ़ियों तक चली इस लंबी लड़ाई में आखिरकार फैसला सरकार के पक्ष में आया है। करीब 150 करोड़ रुपये मूल्य की इस जमीन को कोर्ट ने सीलिंग में अतिरिक्त (सरप्लस) भूमि मानते हुए सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने के आदेश दिए हैं।

42 साल बाद खत्म हुआ विवाद

अन्नपूर्णा मंदिर के पास स्थित इस बहुमूल्य जमीन पर वर्षों से स्वामित्व को लेकर विवाद चल रहा था। मामला इतना लंबा खिंचा कि एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां अदालतों के चक्कर लगाती रहीं। इस दौरान कई स्तरों पर सुनवाई हुई और मामला उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानपुर मंडल की अपर आयुक्त (प्रशासन) रेनू सिंह की अदालत में दोबारा सुनवाई की गई, जिसके बाद अंतिम फैसला सुनाया गया।

सरकार के पक्ष में आया फैसला

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित 130 बीघा भूमि सीलिंग कानून के तहत अतिरिक्त (सरप्लस) भूमि की श्रेणी में आती है। इसलिए इसे सरकारी अभिलेखों में दर्ज किया जाए और सरकार के कब्जे में लिया जाए।

इस फैसले के साथ दशकों से चली आ रही कानूनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है और प्रशासन के लिए जमीन का स्वामित्व स्पष्ट हो गया है।

150 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही कीमत

बताया जा रहा है कि तिर्वा क्षेत्र में स्थित इस जमीन की मौजूदा बाजार कीमत करीब 150 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। क्षेत्र के विकास और बढ़ती जमीन की कीमतों के कारण इसका आर्थिक महत्व काफी बढ़ चुका है।

यही वजह रही कि इस जमीन को लेकर वर्षों तक कानूनी संघर्ष चलता रहा और मामला लगातार अदालतों में विचाराधीन रहा।

तीन पीढ़ियां लड़ती रहीं मुकदमा

इस विवाद की सबसे खास बात यह रही कि मुकदमे की शुरुआत करने वाले लोगों की अगली दो पीढ़ियां भी इस कानूनी लड़ाई का हिस्सा बनी रहीं। 42 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद अब अदालत के फैसले ने इस विवाद पर पूर्ण विराम लगा दिया है।

प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता साफ

अदालत के आदेश के बाद अब प्रशासन सरकारी रिकॉर्ड में जमीन दर्ज करने और आगे की राजस्व संबंधी कार्रवाई करने की प्रक्रिया शुरू करेगा। माना जा रहा है कि फैसले के बाद संबंधित विभाग जल्द ही आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करेगा।

42 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई का अंत न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के लंबे समय से लंबित भूमि विवादों में एक बड़ी मिसाल के रूप में भी देखा जा रहा है।